दुआ हमारी

उसने जो चाहा मिल गया,
खुशिया सारी नसीब हुई
मानो या ना मानो ज़माना,
दुआ हमारी ही कबूल हुई

वो एक शाम थी जब,
आख़िरी बार तुमसे नज़र हुई
उस शाम के बाद हमारी,
ना अभी तक कोई सहर हुई

कभी रहते थे हम तुम्हारे,
ख़यालो का नूर बनकर
वो ख़याल कहाँ खो गये इसकी,
किसिको खबर तक नही हुई

 

Ashwini Sharma

 

 

आदमी खिलोना है

जब भी मेले मे जाता था तो खिलोनो की कई सारी दुकाने देख कर बहुत खुश होता था, ज़िद करता था घरवालो से खिलोने लेने की, और कई बार ज़िद मे कामयाब भी रहता था, खिलोनो को ज़्यादा समझता तो नही था पर जो दिखने मे अच्छा लगता था उसे ही लेने का मान करता था, किसे पसंद नही होते खिलोने सभी को पसंद होते है,

खिलोना लेकर जब घर आता तो सीधे अपने दोस्तो के पास पहुच जाता और उन्हे खिलोना दिखा कर चिढ़हया करता था, लेकिन खिलोनो की खास बात कहे या हमारे मन की, एक ही खिलोना ज़्यादा दीनो तक खुश नही रख पाता, खिलोना तो वही रहता है पर हमारा ये मन ये बदलता रहता है, इसे हर बार कुछ नया मिलता है, मैं भी अपने खिलोने से उब गया था, अब वो खिलोना जिसे मे बड़े चाव से लेकर आया था अब मुझे अच्छा नही लग रहा था,

कुछ दिनो बाद फिर से मेला लगा, और हम फिर से पहुच गये खिलोने की दुकान पे, इस बार ओर अच्छा खिलोना दिखा, उसे लेने की ज़िद की और ले ही आए, अब घर आते ही सबसे पहले पुराने वेल खिलोने को तोड़ के स्टोर रूम मे फेक दिया, ओर नया वाला खिलोना लेकर खुश होता रहा.. वही कुछ दिनो की खुशी, और वो पहले वाला खिलोना दफ़न हो गया जिसने मुझे कुछ दिनो की खुशी दी थी, फिर कभी याद भी नही किया उसे,

मेरी ज़िंदगी भी उस खिलोने की तरह है,

इस कहानी मे वो खिलोना मैं हूँ, ओर उस खिलोने का खरीददार वो है जिसे मेने कुछ वक़्त खुश रखा, मैं अब उसे खुश नही कर पा रहा था, पर मैं तो वही था, बदला भी नही, लेकिन उसका मन बदल गया, और अब वो खरीददार फिर से मेले मे चला गया है, नये खिलोने की तलाश मे, और मैं उसके वापिस लौट आने का इंतेज़ार कर रहा हूँ की कब वो आएगा और मुझे स्टोर रूम मे दफ़न कर जाएगा..

 

Ashwini sharma

 

 

How to forget?

यूँ ही एक समंदर आँखो से बह जाता है
कोई टूटा हुआ ख्वाब जब याद आ जाता है

चाहकर भी मिटा नही पाते उन लकीरो को
जब कोई सबसे प्यारा हमे जख्म दे जाता है

जो खून बनकर उतरा हो कभी नासो मे
नही आता हमे, उसे कैसे बहाया जाता है

ये मेरा दिल है, कभी मोम था, अभी पत्थर है
पर पत्थर को मोम मे कैसे पिघलाया जाता है

 

Ashwini sharma

Alone

टुकड़े ही टुकड़े बिखरे हुए पाता हूँ
जब भी अपने दिल को देख पाता हूँ

एसी क्या सितम हुई उसके साथ
खोजता हूँ, पर जान नही पाता हूँ

क्यूँ, बस इस एक शब्द के सवाल पे
खुद को हमेशा मंज़िल से दूर पाता हूँ

आज जब पुरानी यादो को टटोलता हूँ
खुद को सबसे ज़्यादा बदनसीब पाता हूँ

ज़िंदा होकर भी मैं, मारा हुआ पाता हूँ

Ashwini sharma

 

 

 

Main aur Tum

मैं जैसे पेट्रोल
तुम एक चिंगारी सी
कि जब से छूकर गये हो, आग लगी है बदन मे

मैं जैसे एक तरबूज
तुम तेज छुरी सी
जब से टकराए हो, मिठास बिखेर दी बर्तन मे

मैं जैसे पुरानी शराब
तुम वर्फ़ का एक टुकड़ा सी
जब से घुले हो मुझ मैं, ज़िंदगी चढ़ी है नसो मे

 

Ashwini Sharma

Life-Movie

काश की जिंदगी भी फ़िल्मो की तरह होती
अंत अच्छा हो या बुरा २ घंटे मे ख्त्म तो होती

खुद की कहानी खुद लिखते और किरदार भी
देखता हमे हर कोई और शिकायत भी ना होती

तुम्हारे साथ भी कुछ लम्हे बिता ही लेते
भूमिका हमारी हीरो की होती या विलेन की होती

 

Ashwini Sharma